फुले की 188वीं जयंती / सावित्रीबाई ने महाराष्ट्र में खोला था देश का पहला कन्या विद्यालय, यहां बालिकाओं को पढ़ाने पर फेंका जाता था कीचड़

फुले की 188वीं जयंती / सावित्रीबाई ने महाराष्ट्र में खोला था देश का पहला कन्या विद्यालय, यहां बालिकाओं को पढ़ाने पर फेंका जाता था कीचड़

  • सावित्रीबाई फुले ने स्कूल में छात्राओं को पढ़ाने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी
  • सावित्रीबाई ने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के बाद उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का प्रयास किया

पुणे. भारत की पहली महिला अध्यापिका और समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की आज 188वीं जयंती है।

अपना पूरा जीवन महिला अधिकारों के लिए समर्पित करने वाली सावित्रीबाई ने पुणे में देश का पहला कन्या

विद्यालय खोला था। महिला सशक्तिकरण के लिए काम करने के दौरान उन्हें कड़े संघर्षों को झेलना पड़ा।

महिला अधिकारों की आवाज उठाने के दौरान उन पर कीचड़ फेंका जाता था। उन्होंने कन्या शिशु हत्या को

रोकने के लिए भी काम किया। अभियान चलाए और नवजात कन्या शिशु के लिए आश्रम तक खोला, ताकि

उन्हें बचाया जा सके। फुले की जयंती पर आज हम आपको उनके जीवन से जुड़ीं कुछ दिलचस्प बातें बताने जा रहे हैं।

सावित्रीबाई फुले के पति महात्मा ज्योतिबा फुले को महाराष्ट्र और भारत में समाज सुधार आंदोलन

फुले की 188वीं जयंती / सावित्रीबाई ने महाराष्ट्र में खोला था देश का पहला कन्या विद्यालय, यहां बालिकाओं को पढ़ाने पर फेंका जाता था कीचड़

के सबसे महत्वपूर्ण अगुआकार के रूप में जाना जाता है। ज्योतिबा ने पूरे जीवन महिलाओं और

पिछड़ी जातियों को शिक्षित करने और उन्हें आगे बढ़ाने में बिताया। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा

के नाम से जाने गए। वे सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और मार्गदर्शक थे। सावित्रीबाई ने अपने

जीवन को एक मिशन की तरह से जिया, उन्होंने पूरा जीवन समाज सेवा में बिता दिया।

पूरा जीवन चुनौतियों से भरा रहा
19वीं सदी में समाज में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां व्याप्त थीं।

सावित्रीबाई का जीवन बेहद ही मुश्किलों भरा रहा। दलित महिलाओं के उत्थान के लिए काम

करने, छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें एक बड़े वर्ग द्वारा विरोध भी झेलना पड़ा।

वह स्कूल जाती थीं, तो उनके विरोधी उन्हें पत्थर मारते थे। कई बार उनके ऊपर गंदगी फेंकी गई।

सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुंच कर गंदी हुई साड़ी बदल लेती थीं।

आज से 160 साल पहले जब लड़कियों की शिक्षा एक अभिशाप मानी जाती थी, उस दौरान उन्होंने

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में पहला बालिका विद्यालय खोलकर पूरे देश में एक नई पहल की शुरुआत की।

पुणे में खोला देशा का पहला महिला विद्यालय
1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ी इलाके में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की 9 छात्राओं के

लिए इस विद्यालय की स्थापना की। इसके बाद सिर्फ एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले 5

नए विद्यालय खोलने में सफल हुए। पुणे में पहले स्कूल खोलने के बाद फूले दंपति ने 1851 में पुणे के

फुले की 188वीं जयंती / सावित्रीबाई ने महाराष्ट्र में खोला था देश का पहला कन्या विद्यालय, यहां बालिकाओं को पढ़ाने पर फेंका जाता था कीचड़

रास्ता पेठ में लड़कियों का दूसरा स्कूल खोला और 15 मार्च 1852 में बताल पेठ में लड़कियों का

तीसरा स्कूल खोला। उनकी बनाई हुई संस्था ‘सत्यशोधन समाज’ ने 1876 और 1879 के अकाल में

अन्न सत्र चलाया और अन्न इकटठा करके आश्रम में रहने वाले 2000 बच्चों को खाना खिलाने की व्यवस्था की।

पढ़ाने के साथ-साथ की समाजसेवा
सावित्रीबाई ने स्कूल में छात्राओं को पढ़ाने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी।

उन्होंने 28 जनवरी 1853 को बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह

सभा का आयोजन किया। जिसमें महिलाओं सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जाता था।

सन् 1890 में महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा

करने का प्रयास किया। प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को हुई।

जानिए भारत की पहली महिला शिक्षिका के बारे में
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक दलित

परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई

फुले का विवाह 1840 में समाजसेवी महात्मा ज्योतिबा फुले संग हुआ था। सावित्रीबाई फुले ने अपने

पति महात्मा ज्योतिबा फुले संग मिलकर स्त्रियों के अधिकारों एवं उन्हें शिक्षित करने के लिए

क्रांतिकारी प्रयास किए। भारत की प्रथम कन्या विद्यालय की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव

भी सावित्रीबाई को हासिल है। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने देश

के पहले किसान स्कूल की भी स्थापना की थी। 1852 में उन्होंने दलित बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।

Also Read Here : Tamil Nadu Local Body Election Result: तमिलनाडु स्थानीय निकाय चुनाव के रिजल्ट आज, वोटों की गिनती

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *